How ISIS Drives Muslims from Islam

By Thomas L. Friedman

December 6, 2014

THE Islamic State has visibly attracted young Muslims from all over the world to its violent movement to build a caliphate in Iraq and Syria. But here’s what’s less visible — the online backlash against the Islamic State, also known as ISIS and ISIL, by young Muslims declaring their opposition to rule by Islamic law, or Shariah, and even proudly avowing their atheism. Nadia Oweidat, a senior fellow at the New America Foundation, who tracks how Arab youths use the Internet, says the phenomenon “is mushrooming — the brutality of the Islamic State is exacerbating the issue and even pushing some young Muslims away from Islam.”

On Nov. 24, published a piece on what was trending on Twitter. It began: “A growing social media conversation in Arabic is calling for the implementation of Shariah, or Islamic law, to be abandoned. Discussing religious law is a sensitive topic in many Muslim countries. But on Twitter, a hashtag which translates as ‘why we reject implementing Shariah’ has been used 5,000 times in 24 hours. The conversation is mainly taking place in Saudi Arabia and Egypt. The debate is about whether religious law is suitable for the needs of Arab countries and modern legal systems. Dr. Alyaa Gad, an Egyptian doctor living in Switzerland, started the hashtag. ‘I have nothing against religion,’ she tells BBC Trending, but says she is against ‘using it as a political system.’ ”

The BBC added that “many others joined in the conversation, using the hashtag, listing reasons why Arabs and Muslims should abandon Shariah. ‘Because there’s not a single positive example of it bringing justice and equality,’ one man tweeted. … A Saudi woman commented: ‘By adhering to Shariah we are adhering to inhumane laws. Saudi Arabia is saturated with the blood of those executed by Sharia.’ ”

Ismail Mohamed, an Egyptian on a mission to create freedom of conscience there, started a program called “Black Ducks” to offer a space where agnostic and atheist Arabs can speak freely about their right to choose what they believe and resist coercion and misogyny from religious authorities. He is part of a growing Arab Atheists Network. For Arab news written by Arabs that gets right in the face of autocrats and religious extremists also check out

Another voice getting attention is Brother Rachid, a Moroccan who created his own YouTube network to deliver his message of tolerance and to expose examples of intolerance within his former Muslim faith community. (He told me he’s converted to Christianity, preferring its “God of love.”)

In this recent segment on YouTube, which has been viewed 500,000 times, Brother Rachid addressed President Obama:

“Dear Mr. President, I must tell you that you are wrong about ISIL. You said ISIL speaks for no religion. I am a former Muslim. My dad is an Imam. I have spent more than 20 years studying Islam. … I can tell you with confidence that ISIL speaks for Islam. … ISIL’s 10,000 members are all Muslims. … They come from different countries and have one common denominator: Islam. They are following Islam’s Prophet Muhammad in every detail. … They have called for a caliphate, which is a central doctrine in Sunni Islam.”

He continued: “I ask you, Mr. President, to stop being politically correct — to call things by their names. ISIL, Al Qaeda, Boko Haram, Al Shabab in Somalia, the Taliban, and their sister brand names, are all made in Islam. Unless the Muslim world deals with Islam and separates religion from state, we will never end this cycle. … If Islam is not the problem, then why is it there are millions of Christians in the Middle East and yet none of them has ever blown up himself to become a martyr, even though they live under the same economic and political circumstances and even worse? … Mr. President, if you really want to fight terrorism, then fight it at the roots. How many Saudi sheikhs are preaching hatred? How many Islamic channels are indoctrinating people and teaching them violence from the Quran and the hadith? … How many Islamic schools are producing generations of teachers and students who believe in jihad and martyrdom and fighting the infidels?”

ISIS, by claiming to speak for all Muslims — and by promoting a puritanical form of Islam that takes present-day, Saudi-funded, madrasa indoctrination to its logical political conclusion — has blown the lid off some long simmering frustrations in the Arab Muslim world.

As an outsider, I can’t say how widespread this is. But clearly there is a significant group of Muslims who feel that their government-backed preachers and religious hierarchies have handed them a brand of Islam that does not speak to them. These same authorities have also denied them the critical thinking tools and religious space to imagine new interpretations. So a few, like Brother Rachid, leave Islam for a different faith and invite others to come along. And some seem to be quietly detaching from religion entirely — fed up with being patronized by politically correct Westerners telling them what Islam is not and with being tyrannized by self-appointed Islamist authoritarians telling them what Islam is. Now that the Internet has created free, safe, alternative spaces and platforms to discuss these issues, outside the mosques and government-owned media, this war of ideas is on.



Muslim Denial: मुसलमानों की नकारात्मक मानसिकता: खुद साख्ता खलीफा बगदादी से निपटने के लिए उसे एक यहूदी और मोसाद का एजेंट माना जाए, बकौल मौलाना अबु-अल-ईरफ़ान फिरंगी महली, लेकिन क्या यह तर्ज़ फिक्र कारगर है?

सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम

  23 अक्टूबर 2014

मुसलमान सच्चाई का समाना कब तक नहीं करेंगे: अपने आप को ‘खलीफा’ घोषित करने वाले बगदादी को जवाब देने का एक तरीका यह भी है कि उसे यहूदी और मोसाद का एजेंट कहा जाए।

जैसा कि मौलाना अबुल इरफान फिरंगी महली कर रहे  हैं, क्या इस से कोई फायदा होगा?

क्या अपने आपको मुसलमानों का खलीफा कहने वाले अबु बकर बग़दादी उर्फ इब्रहिम एक यहूदी हैं और मोसाद के गुप्त एजेंट है? क्या यह मुसलमानों में खून खराबा और लड़ाई झगड़ा करवाने वाली यूरोपीय ताक़तों के हाथ की कठपुतली है? क्या यह उस योजना का अंग है, जो मुसलमान को ऐसे समुदाय के रुप में दर्शाना चाहता है कि ये लोग इस्लाम के नाम पर ख़ून ख़राबे और हिंसा में विश्वास रखते है? इंटरनेट पर बहुत से  ब्लागों और पोस्टरो में विभिन्न रिपोर्टों के हवाले से यह प्रश्न उठाए गए हैं, जो यह दावा करते हैं कि अपने आपको ‘खलीफा’ और अमीर-उल-मोमनीन कहने वाले अबु बकर इब्राहिम अल-बग़दादी वास्तव में एक यहूदी है और उन के माता-पिता यहूदी हैं। उन का वास्तविक नाम सिमोन इलिएट है और इन्हें अरब देशों में अल्लाह अर्थात् इस्लामिक खिलाफत का शासन स्थापित करने के बहाने से मध्य एशिया में संघर्ष और ख़ून ख़राबा करने का काम मोसाद और सी आई ए ने सौंपा है।

इन पड़यंत्र वाली कहानियों पर विश्वास करने वाले कुछ लोग यह भी कहते है कि यहूदी पृष्ठभूमि से आने वाले बहुत से नव-मुस्लिमों  ने एक पडयंत्र के तहत अल-क़ायदा और अन्य उग्रवादी संगठनों में शामिल हो गए हैं।

ब्रिटेन में 3,000 नव मुसलमानों का आई एस आई एस में शामिल होना भी, उन मुसलमानों के ज़ेहन में संदेह उत्पन्न करता है, जो सहज ही मध्य-एशिया में अमेरिका और अन्य यूरोपीय देशों के खेल के बारे में पड़यंत्र वाली कहानियों पर विश्वास कर लेते हैं। वे यह भी कहते हैं कि इनमें न जाने कितने अमेरिकी और ब्रिटिश एजेंट है या उन के गुप्तचर हैं। अमेरिकी सचेतक रॉबर्ट स्नडेन की रिपोर्ट का भी प्रयोग भी इसी विचार को मजबूत बनाने के लिए  किया जाता है कि बग़दादी अमेरिका और इज़राइल का एजेंट है। और इन्हें मुसलमानों में संप्रदायिक और नस्लवादी संघर्ष पैदा कर करके इन देशों को राजनैतिक और आर्थिक हितों का बढ़ावा देने के लिए ही मध्य एशिया में बैठाया गया है।

यद्यपि, कुछ मुसलमान नई-नई पड़यंत्र वाली कहानियों में विश्वास करके शांत हो जाते हैं, पर पूरी दुनिया में बहुत से मुसलमान बग़दादी को अपना समर्थन दे रहे हैं, उन्हें इस बात का कतई इल्म नहीं है कि यह भी सऊदी वहाबी राजशाही की ही तरह इस्लाम का दुश्मन हो सकता है। सऊदी वहाबी राजशाही नें इस्लामिक इतिहास की लगभग सभी निशानियों को नष्ट कर दिया है।

फिरंगी महल, लखनऊ के वरिष्ठ शिया धर्म गुरु मौलाना अबुल इरफान फिरंगी का इस में आगे दिया गया लेख आँख खोलने वाला है। इससे पता चलता है कि तथाकथिक मॉडरेट (मध्यभागी) मुसलमान इस्लामिक विचार धारा और समुदाय में उग्रवाद के अस्तित्व को नकारने के लिए किस हद तक जा सकते हैं। इस लेख के अंत में दी गई लिंक पर जाकर मौलाना की पडयंत्र की कहानी के स्रोत तक जाया जा सकता हैं।

सऊदी वहाबी वंश के बारे में भी, इसीप्रकार पडयंत्र के विचारों का सहारा लिया जाता है, जिस में राजशाही के राजनैतिक और सैद्धांतिक संस्थापक मुहम्मद बिन सौद और मुहम्मद इब्ने अब अल वहाब, दोनों को यहूदी और ईसाई मूल वाला और ब्रिटिश राजशाही का एजेंट माना जाता है, उन्हें उसी प्रकार से ब्रिटिश एजेंट माना जाता है। जिस प्रकार अब बग़दादी को इज़रायली अमेरिकी एजेंट बाताया जाता रहा हैं। परन्तु मुसलमानों को उन्हें अपने नेता मानने में कोई एतराज नहीं हैं। इसी प्रकार यदि तथाकथिक इस्लामिक राज्य को स्थापना हो जाती है, और सुन्नी राजशाहियों और अमीरात और आम मुसलमान, इसे जितना समर्थन दे रहे, उसे देखते हुए लगता है कि ऐसा हो भी सकता हैं। और यदि ऐसा हुआ तो यह नहीं लगता है कि वैश्विक मुस्लिम समुदाय को इसे अपना नेता मानने में कोई आपत्ति होगी।

पड़यंत्र की कहानियों ने सऊदी राजतंत्र के लिए मुस्लिम समर्थन को रोका नहीं है और ये अपने को खलीफा बग़दादी कहने वाले मामले में भी नाकामयाब सिद्ध होगी। यह सब रोकने में जो बात प्रभावी सिद्ध हो सकती है और जिसे स्थिर मन से और लगातार कभी प्रयोग नहीं किया गया और जो अब काम कर सकता हैं वह खारजिअतः (Kharjites)अब नए Kharjites के चरमपंथी सिद्धांतों का गंभीरता से जवाब देना।

इस्लाम में पूरे इतिहास में बहुत से चरमपंथी रहें हैं। उन्हें एम आई6, सी आई ए, के जी बी और मोसाद एजेंट नहीं कहा जा सकता है। इस विचारकों को जनता का अलग-अलग स्तर पर समर्थन प्राप्त हुआ है।

उदाहरण के लिए, जब अब्दुल वहाब ने सैद्धांतिक गुरु तकी अद-दिन अहमद इब्ने तैमिया की मृत्यु हुई। उस समय अपधर्म के आरोपों के कारण कई वर्षो से जेल में बंद थे, हजारों लोग उनके लिए दुआ करने के लिए एकत्रित हुए और उन्हें सूफी कब्रिस्तान में दफनाया गया और जिन्हें अभी भी कुछ लोग शेख-उल-इस्लाम कहते हैं।

हम मुसलमान कम से कम हम में से वे लोग जो अपने समाज को इस दल दल से निकालना चाहते हैं, जिस में हमने अपने आप को फंसा लिया है, उन्हें यह सोचना होगा कि सैद्धांतिक धरातल पर हम गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं और हमें इससे निकलने के लिए कठिन परिश्रम करना होगा जिस का आग़ाज बहुत ही बेसिक प्रश्न से होगाः मुसलमान कौन हैं। एक समाज जिस के पास इस प्रश्न का जवाब नहीं है कि किसे इस बात का अधिकार है कि उसे इस समाज का सदस्य कहा जाए, तो ऐसे समाज को आधुनिक दुनिया में शामिल होने में अभी बहुत समय लगेगा।

कृपया नीचे मौलाना अबुल इरफान फिरंगी महली के मूलतः उर्दू में लिखे गए लेख का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ें। जब मैंने इसे पहली बार पढ़ा तो मैं तय नहीं कर पाया कि इस पर हँसू या रोऊँ। कृप्या न्यू एज इस्लाम फोरम पर अपनी प्रतिक्रिया दें।

—— सुल्तान शाहीन, एडिटर, न्यु एज इस्लाम


यहूदी ब शक्ल बग़दादी

अबूल इरफ़ान फिरंगी महल्ली, काजी शहर लखनऊ

22 अक्टूबर, 2014

एक अरसे से इस्लाम दुश्मन ताक़तें इस्लाम को नुकसान पहुँचाने के लिए लगातार नसरानीयों और यहूदियों को मुसलमानों के रूप में अपना एजेंट बनाकर मुसलमानों को आपस में लड़ा रही हैं और फिर उसके द्वारा दोनों हाथों से तेल और गैस की दौलत को लूट रही हैं। यही कारण है कि कभी अंग्रेज जासूस हमफरे तो कभी लॉरेंस ऑफ अरबिया तो कभी मोसाद का यहूदी एजेंट साइमन अलियाट अबू बग़दादी बनकर सीरिया और इराक में प्रवेश हो गया है। जिस के द्वारा ब्रिटेन, अमेरिका और इजराइल दोनों हाथों से मुस्लिम देशों की तेल और गैस की दौलत को लूट रहे हैं। अबू बकर बग़दादी जिसके बारे में अब यह खुलासा हो चुका है कि इस का संबंध यहूदी धर्म से है और मुसलमान बनकर मुस्लिम देशों के लिए खतरा बना हुआ है। यह व्यक्ति अपने आप को पूरी दुनिया के मुसलमानों का खलीफा कह रहा है और उसने दुनिया भर के मुसलमानों से जिहाद की अपील की है। बड़े दुख के साथ कहना पड़र रहा है कि लखनऊ के कुछ तथाकथित मौलवी भी बिना सोचे समझे उसे अखबारों द्वारा मुबारकबाद पेश करते है और किसी ने बग़दादी से खुश होकर अपनी सामाजिक साइट पर यहूदी सरकार का नक्शा लगाकर सुबहान अल्लाह लिख दिया। जब यह बात मीडिया में फैलने लगी तो वो हजरत तरह तरह के रंग बदलने लगे। कुछ बेवकूफों ने कश्मीर में दाइश सरकार का काला झंडा लहरा दिया तो कुछ हाजियों ने बगदादी को अपना खलीफा समझकर हज के दिनों में अराफात के मैदान में बगदादी संगठन का काला झंडा लहरा दिया। ऐसी बेवकूफियाँ करने के कारण जहां एक ओर इस्लाम का नाम बदनाम हो रहा है वहीं दूसरी कौमें बेगुनाह मुसलमानों को शक की निगाह से देख रही हैं। बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि जिस तरह से हमफरे और लॉरेंस ऑफ अरबिया को देर से पहचानने के कारण बहुत नुकसान हुआ, उसी तरह से बग़दादी जैसे यहूदी को न पहचानने के कारण नुकसान हो रहा है। हमफरे और लॉरेंस के दौर में इंटरनेट नहीं था, इसलिए ऐसे लोगों को पहचानना जरूर मुश्किल था। लेकिन इंटरनेट के इस दौर में यह काम बहुत आसान है। जिस को भी बग़दादी के यहूदी होने में या अमेरिका, इजरायल और ब्रिटेन का एजेंट होने में संदेह है उसे चाहिए कि वह इंटरनेट पर जाकर अंग्रेजी में अबू बग़दादी इज़ जीव (Abu Baqar Baghdadi is Jew) टाइप कर के इडर्ब स्नो डेन (Edwarb Snow Den) रिपोर्ट देख ले। जिसमें साफ लिखा है कि बग़दादी के माँ बाप यहूदी हैं उसका नाम साइमन एलियाट है। यह मोसाद का एजेंट है और उसके द्वारा ब्रिटेन, अमेरिका और इजरायल की खुफिया एजेंसियां ​​मिडिल ईस्ट में आतंकवाद को बढ़ावा दे रही हैं।

उस व्यक्ति की कई पुरानी तस्वीरें भी इंटरनेट पर मौजूद हैं। इसलिए इस समय बगदादी जैसे यहूदी को पहचानना बहुत आसान है। लेकिन यह काम वही लोग कर सकते हैं जो आतंकवादियों और इंसानी खून से होली खेलने वालों से नफरत करते होंगे। मगर जिन्हें झगड़ा और दंगे करवाने में आनंद आता है या फिर वह सऊदी अरब या क़तर जैसी वहाबी सरकारों या अमेरिकी और इजरायली सरकार के एजेंट हैं वह ऐसा काम कभी नहीं करेंगें इसलिए मैं उन एजेंटों से नहीं बल्कि उन लोगों से जो बगदादी की सच्चाई जानना चाहते हैं यह कहूंगा कि वो इंटरनेट के द्वारा तथ्य जान लें तो उन्हें पता चल जाएगा कि वे बगदादी मुसलमान ही नहीं है बल्कि यहूदी है और वह भी लॉरेंस और हमफरे की तरह ब्रिटेन, अमेरिका और इसराइल का एजेंट है जिसे सऊदी अरब और क़तर ने मिलकर तैयार किया है और वह यहूदी मुसलमान बनकर इस्लाम को बदनाम कर रहा है और इतना ही नहीं बल्कि वे इस्लाम, मानवता और शांति के लिए एक बड़ा खतरा बना हुआ है। इसलिए हर एक जिम्मेदार व्यक्ति को चाहिए कि वह अबू बकर बग़दादी जैसे यहूदी और यहूदी एजेंट को खलीफतुलल्लाह समझने के बजाय लानतुलल्लाह समझें और बग़दादी जैसे आतंकवादियों के द्वारा संचालित आई एस आई एस, अल क़ायदा, बोको हराम, अल नुसरह, तालिबान और लश्कर जैसे संगठनों और उन्हें पैदा करने वालों या उनके किसी भी तरह की मदद करने वालों का विरोध करें और साथ ही मूर्ख और जाहिल किस्म के दंगाई मौलवियों से अपने को दूर ही रखें।

22 अक्टूबर, 2014 स्रोतः रोज़नामा सहाफत, लखनऊ

URL for English article:,terrorism-and-jihad/sultan-shahin,-editor,-new-age-islam/muslim-denial-knows-no-bounds–one-way-of-dealing-with-self-styled–khalifa–baghdadi-is-to-call-him-a-jew-and-a-mossad-agent,-as-does-maulana-abul-irfan-firangi-mahli,-but-will-it-work?/d/99675

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